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The Life - Path to Liberation

Change the point of view then object become subject and subject become object. And finally object and subject both lost only view is there .. Such a big fool I am. Never understood this image due to ego of modern science education .. When understand this then came to know the entre life has been depicted by concious scientist of ancient india . We put our traditional concious scientist into bracket of Dhrma and throw away into dump yard and started western philosophy thinking that it is evolution . Let's understand this image 1. The Elephant (Past Karma) ​The black, angry elephant represents the accumulated past karmas from countless lives. These karmas have grown immense in strength and are always ready to uproot the present moment. This Karma elephant always running behind . ​2. The Green Tree (Present Life) ​The green tree symbolizes our present life. Its branch represents time —continuously being gnawed by the black and white rats ( day and night ), showing th...

पारिवारिक कलह — आधुनिक शिक्षा का उपहार

ज्यादातर मामलों में पारिवारिक झगड़ों का कारण सिर्फ और सिर्फ “रिएक्शन” होता है — एक त्वरित प्रतिक्रिया (quick reaction) जो क्रोध और आपसी कलह को जन्म देती है। जैसे हम बिजली के बल्ब हों — किसी ने बटन दबाया और हम जल उठे। बहुत दिनों तक सोचता रहा कि ऐसी प्रकृति हमारी क्यों बन गई? कुछ लोगों ने इसे व्यक्तिगत स्वभाव का नाम दे दिया। लेकिन लगता तो नहीं कि यह मनुष्य-जाति का स्वभाव है। यदि यह स्वभाव होता तो मनुष्य को भी हिंसक जानवरों की तरह नुकीले नाखून, सींग या ऐसा कोई अंग अवश्य मिला होता, जो क्रोध से उत्पन्न हिंसा को सहारा दे सकता। लेकिन ऐसा है नहीं। इसका मतलब यह है कि यह एक तरीके से विकसित किया गया “व्यवहार पैटर्न” है। अच्छी तरह गौर करें तो पाएँगे कि जो जितना आधुनिक शिक्षा से “शुशोभित” (decorated) है, वही उतनी जल्दी रिएक्शन करता है। आधुनिक मेडिकल साइंस कहती है कि यदि किसी को बार-बार गुस्सा आता है, चिड़चिड़ापन बना रहता है, तो इसके पीछे शरीर में cortisol, adrenaline, testosterone, serotonin जैसे हार्मोन का असंतुलन जिम्मेदार होता है। मतलब कहीं न कहीं इन हार्मोनों का संतुलन उम्र के किसी पड़ाव पर बिग...

Thrownness

We are thrown into birth in an unknown body, family, culture, society, religion, city, and country — all without our consent. We do not feel troubled by this until our consciousness begins to develop. As soon as consciousness awakens, we start demanding, blaming, and desiring… But why does this happen? Who is responsible — we, as the innocent child, or the influence of consciousness itself? We confine ourselves within the boundaries of attachments — attachment to family, society, religion, and country. And all conflict begins with this confinement. Thrownness becomes a subtle mental condition that remains unnoticed throughout life, yet produces ego, envy, anger, and desire. Martin Heidegger described this condition as Geworfenheit (German), or “Thrownness” — the fact that human beings are “thrown” into existence. Heidegger also noted that Thrownness is an infinite loop (an ontological state). But if we interpret it in the framework of Indian spirituality — like the cycle of moksha → li...

रामायण or way for liberation

रावण को यदि अहंकार माने , माता सीता को  बुद्धि तो फिर रामायण मोक्ष पाने के रास्ता दिखा देती है। When mind falls into the trap of Ego , then to come out from this state, Rama (inner soul) has to be get activated to become liberated and free mind from clinch of ego  ..  When a person makes an empire due to the influence of desire ( मृग तृष्णा)  , ego attacks on mind and takes away mind to keep it permanently in its captivity.. एक बार बुद्धि , अहंकार के कब्जे में आ गई तो उसे बाहर निकालना आसान नहीं है। A lot of efforts needed to kill hidden enemies ....Same as explained in Ramayana.. Let's start understanding .. अरण्यकाण्ड (अरण्य का मतलब जंगल, यानी विचारों का जंगल, जहाँ नाना प्रकार के विचार स्वतंत्र विचरण करते रहते हैं।) उसी क्रम में तीन विचारी असुर सबसे पहले मारे गए खर, दूषण और त्रिशिरा – दूषित विचार, अज्ञान के वश में होना, सही दिशा को छोड़कर बाकी तीन गलत दिशाओं में भटकना, अनिर्णय की अवस्था।  (This is the state of mind that, influenced by contaminated ideas, indulg...

पवन पुत्र हनुमान

एक नए नजरिए से समझते हैं कि कैसे हम सबके अंदर हनुमान छिपे हुए हैं। ​तुलसीदास जी की हनुमान चालीसा में जिस तरीके से हनुमान जी का वर्णन किया है, उसी को आधार बनाकर समझने की कोशिश करते हैं। ​"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।" ​हनुमान जी की जय हो, जिनमें ज्ञान (आत्मबोध, विवेक) और गुण (साहस, करुणा, समर्पण, बल) का सागर हो। अपार गुण और अपार ज्ञान जिस सागर से प्राप्त होता हो। ​"जय कपीस तिहुं लोक उजागर।" ​कपीस को समझें तो वानर के अलावा इसका अर्थ होता है "ग्रहण करने की अपार शक्ति वाला स्वामी" और तीन लोक का मतलब शरीर, मन, चेतना। ​उजागर - किसी तथ्य को रोशनी में लाना। ​जय हो हनुमान जी की, जिन्होंने शरीर, मन, चेतना को अपार शक्ति प्रदान की हो और फिर उस जीवन को इस लोक में लाया गया।  (अब ग्रहण क्या किया गया? सोचने वाली बात है।) ​"राम दूत अतुलितबलधामा।" ​Rama is the inner soul, then without exhale and inhale, the soul cannot stay in the body. So, it is a messenger of the soul and has immense power to keep this whole body alive to perform any kind of task. ​"अंजनी पुत्...

The Observer

Once upon a time, farmers were given great importance because they grew crops for food... Nowadays, even more importance is given to "engagement farmers." New money magnets are a new kind of farmer – engagement farmers... To be a good engagement farmer, you just need to understand the pattern... Earlier there were 4 kinds of people: 1. One who set patterns 2. One who sells patterns 3. One who preserves and amplifies patterns 4. One who flows in patterns We never understood this;  no school , no college , no society teaches about this , they teach you to grasp readymade thoughts but never thinking process . do you know why ? Now the cycle rotates and has come to this point again... The winner will be the one who can set patterns – a KING (very few in quantity). Who can sell patterns – a shrewd businessman (a little more than Kings in quantity) Who can preserve and amplify – technocrats, super-intelligent (more than businessmen ) Who flow in patterns – users ( in millions or bi...

नव दुर्गा या मोक्ष प्राप्ति का सूत्र ?

नव दुर्गा ? ... या मोक्ष प्राप्ति का सूत्र ?  धैर्य ,ब्रह्मचर्य और मन पर नियंत्रण करके ऊर्जा के प्रवाह को उच्च अवस्था में लाकर मोक्ष के लिए सेनानायक बन कर विचारों को समयातीत स्थापित कर विशुद्ध स्वरूप से मिलन पर ही सिद्धि प्राप्त होती है। ये ही बात नवदुर्गा के रूप में लाखों सालों तक लोगों के दिमाग मे डालने की ही प्रथा है नवरात्रि ।  In a same sequence each day has been allocated to explain the importance of each act . Day 1 धैर्य (शैलपुत्री) → साधना का आधार है। पर्वत की पुत्री की तरह अडिग रहना। Day 2 ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचारिणी) → ऊर्जा का संरक्षण और तप में स्थिरता। Day 3 मन पर नियंत्रण (चन्द्रघण्टा) → जब मन में ध्वनि-तरंग (घण्टा) और चन्द्रमा जैसी शीतलता का संतुलन होता है, तभी साधक स्थिर होता है। Day4 ऊर्जा का प्रवाह (कूष्माण्डा) → भीतर ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की रचना और विस्तार। Day 5 सेनानायक बनना (स्कन्दमाता) → अंतःशक्ति को दिशा देना; विचारों और इन्द्रियों का नेतृत्व करना। Day 6 विचारों को समयातीत करना (कात्यायनी) → समय, कर्म और मन की सीमाओं से परे जाकर ‘शुद्ध संकल्प’ धारण करना। Day...

रिटायरमेंट के बाद आध्यात्मिक जीवन की दिशा

रिटायरमेंट या 60 के बाद के लोगों के पास मूल्यवान समय बहुत होता है जो अन्य के पास नहीं होता , कुछ लोगों को वही समय काटने दौड़ता है। कैसे इस समय को उद्देश्य प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करें? और वो उद्देश्य क्या होना चाहिए? समझने की कोशिश करते हैं। समस्या की जड़ ढूंढ़ने जाओ तो पाओगे कि परेशानी बुढ़ापे में शुरू नहीं हुई बल्कि बचपन से शुरू हुई थी - बुढ़ापे में तो विकराल रूप ले लिया है। बचपन से 24-25 साल तक हम लोग स्कूलों में जाकर पढ़ाई करते हैं फिर आगे का 35 से 40 साल का जीवन अपनी मर्जी से जीने का और ऐसा मन की गहराई में बैठ जाता है कि सब "मैं ही कर रहा हूँ, मैंने ही सब पाया है".... (एक अहंकार गहराई तक मन में बैठ चुका होता है ) लेकिन इस दौरान भूल जाते हैं कि अपनी मर्जी से यहाँ कुछ नहीं होता है, होता वो ही है जो परमात्मा चाहता है। यही भूला हुआ सत्य 60 के बाद जीने को मुश्किल बना देता है। यदि 60 के बाद मान लें कि हम कुछ नहीं थे न कुछ हैं। अब उसी परमात्मा को समर्पण कर देना है अपने आपको, तो फिर मृत्यु की आहट को भी गले लगाना सीख लेंगे। आसान नहीं है ये सीखना - उससे पहले परमात्मा का अनुभव तो ...

सत्य और धर्म की द्वंद्वात्मकता

सत्य और धर्म की द्वंद्वात्मकता धर्म को पकड़ोगे तो "संपूर्ण सत्य" छूट जाएगा और "संपूर्ण सत्य" को पकड़ोगे तो धर्म छूट जाएगा। इसलिए धार्मिक लोगों ने सत्य को न पकड़कर सत्य को जानने वालों को पकड़ लिया। क्योंकि भीड़ को इसी में ही खुश रखा जा सकता है ताकि भीड़ को बस ये आभास कराया जाए कि इन्होंने सत्य को जाना है, लेकिन भीड़ के ठेकेदार कभी नहीं चाहेंगे कि भीड़ में से किसी को सत्य का ज्ञान हो जाए। सत्य के चारों तरफ इतनी बड़ी-बड़ी अतिश्योक्तियों की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं, दुर्गम मार्ग बना दिए गए हैं। सब बाहरी दिखावे के लिए जबकि सत्य का अनुभव तो अंदर से आता है। इसलिए भीड़ के चक्कर में पड़कर धर्म की धारणाओं में बंधकर संपूर्ण सत्य को नहीं जान सकते। सत्य स्वतंत्र है, सत्य मुक्त है, सत्य स्वभाव है, बस अपने में झांककर ही अनुभव किया जा सकता है। और अपने को जानने का कौन सा रास्ता का चुनाव करते हो वो भी अपने आप पर ही निर्भर है - या तो बुद्ध, महावीर जैसा ध्यान या मीरा, राधा जैसा समर्पण या श्रीकृष्ण के ध्यान, कर्म और ज्ञान के मार्ग।

जीरो और वन (0,1)

  बहुत दिनों से सोच रहा था, पूरा पश्चिम का विज्ञान जीरो और वन (0,1) पर टिका है, या तो है या नहीं है... वे भी मानते हैं सत्य-असत्य है, सुख-दुख है, जो है उसका एक दूसरे के साथ नकारात्मक या सकारात्मक कोई न कोई तादात्म्य है, जैसे "मैं" हूँ क्योंकि "तू" है.. लेकिन जब पूर्व के अध्यात्म की बात करते हैं तो यहाँ 2 से आगे 3 है....एक त्रिमूर्ति है जिसे ब्रह्मा-विष्णु-महेश के रूप में इतनी गहराई तक बिठा दिया है ताकि लाखों-करोड़ों वर्षों तक इस मूलभूत तथ्य को भूल न सकें। कैसे? सत्य-असत्य है - इसका संदर्भ क्या है? वही तीसरा है। सुख-दुख है - उसे देख कौन रहा है? वही तीसरा है। कुछ इस तरह से समझो कि जैसे पार्क में लगा "seesaw" बच्चों का झूला होता है, उसमें एक ऊपर जाता है, एक नीचे - यही जीरो और वन की तरह होते हैं, लेकिन धुरी (केंद्र) जो पूरी तरह से स्थिर है, वही तीसरा है जिसके सापेक्ष यह सब ऊपर-नीचे हो रहा है.. बिना धुरी के दोनों का अस्तित्व नहीं हो सकता.. अष्टावक्र की भाषा में यह धुरी की अवस्था ही साक्षी भाव है। महावीर-बुद्ध की भाषा में यही मोक्ष भाव है। द्वैत और अद्वैत की भाष...