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महामृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ प्रचलित भावार्थ - हे तीन नेत्रों वाले भगवान शिव! हम आपकी उपासना करते हैं, जो सुगंध की तरह सर्वत्र व्याप्त हैं और सबका पोषण करने वाले हैं। जैसे पका हुआ फल (ककड़ी) अपने बंधन से सहज ही अलग हो जाता है, वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, परंतु अमृत (मोक्ष) से वंचित न करें। टिप्पणी - "ॐ" की ध्वनि ही सम्पूर्णता है। "त्र्यम्बकम्", "जिसके तीन नेत्र हैं वो शिव है" या "वो शिव है जिसके तीन नेत्र हैं", दोनों में बड़ा फर्क है। सिर्फ तीन नेत्र वाले ही शिव हैं तो फिर किसी और के तीन नेत्र या नेत्र का मतलब दृष्टि, तो तीन दृष्टि होना ही शिव है। तीन दृष्टि है क्या? क्या तीन दृष्टि अर्थात् तीसरी अवस्था को देखना ही तो तीसरी दृष्टि है। "सुख और दुःख", "दिन रात", "जन्म मृत्यु" सब कुछ ही तो दो में है, फिर तीसरा क्या है? उसे देखने के लिए ही तो तीसरी दृष्टि चाहिए और उसके लिए नेत्र। फिर तीसरा नेत्र तो मन का ही एक रूप हुआ जो इन दो अवस्थाओं को देख सक...