बहुत दिनों से सोच रहा था, पूरा पश्चिम का विज्ञान जीरो और वन (0,1) पर टिका है, या तो है या नहीं है... वे भी मानते हैं सत्य-असत्य है, सुख-दुख है, जो है उसका एक दूसरे के साथ नकारात्मक या सकारात्मक कोई न कोई तादात्म्य है, जैसे "मैं" हूँ क्योंकि "तू" है.. लेकिन जब पूर्व के अध्यात्म की बात करते हैं तो यहाँ 2 से आगे 3 है....एक त्रिमूर्ति है जिसे ब्रह्मा-विष्णु-महेश के रूप में इतनी गहराई तक बिठा दिया है ताकि लाखों-करोड़ों वर्षों तक इस मूलभूत तथ्य को भूल न सकें। कैसे? सत्य-असत्य है - इसका संदर्भ क्या है? वही तीसरा है। सुख-दुख है - उसे देख कौन रहा है? वही तीसरा है। कुछ इस तरह से समझो कि जैसे पार्क में लगा "seesaw" बच्चों का झूला होता है, उसमें एक ऊपर जाता है, एक नीचे - यही जीरो और वन की तरह होते हैं, लेकिन धुरी (केंद्र) जो पूरी तरह से स्थिर है, वही तीसरा है जिसके सापेक्ष यह सब ऊपर-नीचे हो रहा है.. बिना धुरी के दोनों का अस्तित्व नहीं हो सकता.. अष्टावक्र की भाषा में यह धुरी की अवस्था ही साक्षी भाव है। महावीर-बुद्ध की भाषा में यही मोक्ष भाव है। द्वैत और अद्वैत की भाष...
what I heard in deep silence I write it here