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सत्य और धर्म की द्वंद्वात्मकता

सत्य और धर्म की द्वंद्वात्मकता धर्म को पकड़ोगे तो "संपूर्ण सत्य" छूट जाएगा और "संपूर्ण सत्य" को पकड़ोगे तो धर्म छूट जाएगा। इसलिए धार्मिक लोगों ने सत्य को न पकड़कर सत्य को जानने वालों को पकड़ लिया। क्योंकि भीड़ को इसी में ही खुश रखा जा सकता है ताकि भीड़ को बस ये आभास कराया जाए कि इन्होंने सत्य को जाना है, लेकिन भीड़ के ठेकेदार कभी नहीं चाहेंगे कि भीड़ में से किसी को सत्य का ज्ञान हो जाए। सत्य के चारों तरफ इतनी बड़ी-बड़ी अतिश्योक्तियों की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं, दुर्गम मार्ग बना दिए गए हैं। सब बाहरी दिखावे के लिए जबकि सत्य का अनुभव तो अंदर से आता है। इसलिए भीड़ के चक्कर में पड़कर धर्म की धारणाओं में बंधकर संपूर्ण सत्य को नहीं जान सकते। सत्य स्वतंत्र है, सत्य मुक्त है, सत्य स्वभाव है, बस अपने में झांककर ही अनुभव किया जा सकता है। और अपने को जानने का कौन सा रास्ता का चुनाव करते हो वो भी अपने आप पर ही निर्भर है - या तो बुद्ध, महावीर जैसा ध्यान या मीरा, राधा जैसा समर्पण या श्रीकृष्ण के ध्यान, कर्म और ज्ञान के मार्ग।