रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ ऐसे इतिहास हैं, जो आज भी “सत्य” का बोध करा सकते हैं। या यूँ कहें कि वे “सत्य” का बोध करा सकते हैं, इसलिए ही ऐसे इतिहास हैं जो सदियों तक जीवित रह सकते हैं। यह बात समझने के लिए रामायण और महाभारत पढ़ना पर्याप्त है — किंतु उनमें छिपे “सत्य” के रहस्य को तभी जाना जा सकता है, जब “सत्य” का अनुभव हो चुका हो। “सत्य” इतना विशाल और इतना सूक्ष्म है कि न तो उसे शब्दों में समझाया जा सकता है, न ही बातों से — उसे केवल अनुभव किया जा सकता है। चाहे वह अनुभव लाओत्से, हेराक्लाइटस, सुकरात, बुद्ध, महावीर, जीसस, मोहम्मद, विवेकानंद, रामकृष्ण, कृष्णमूर्ति, कबीर, रैदास या गुरु नानक को हुआ हो — या फिर आपको और मुझे। और वह अनुभव किया जा सकता है, पर वह हर व्यक्ति में अलग रूप में प्रकट होता है — अलग होना भी चाहिए। जैसे इन श्रेष्ठतम पुरुषों ने अपने-अपने ढंग से अनुभव किया। किसी एक का अनुभव दूसरे से बिल्कुल विरोधाभासी भी हो सकता है — इसी बात को श्रीराम और श्रीकृष्ण समझा रहे हैं। दोनों का स्वभाव और चरित्र एक-दूसरे के विपरीत हैं — जहाँ श्रीराम मर्यादा से कभी बाहर नहीं निकले, वहीं श्रीकृष्ण ने क...
what I heard in deep silence I write it here