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रिटायरमेंट के बाद आध्यात्मिक जीवन की दिशा

रिटायरमेंट या 60 के बाद के लोगों के पास मूल्यवान समय बहुत होता है जो अन्य के पास नहीं होता , कुछ लोगों को वही समय काटने दौड़ता है।

कैसे इस समय को उद्देश्य प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करें? और वो उद्देश्य क्या होना चाहिए?

समझने की कोशिश करते हैं।

समस्या की जड़ ढूंढ़ने जाओ तो पाओगे कि परेशानी बुढ़ापे में शुरू नहीं हुई बल्कि बचपन से शुरू हुई थी - बुढ़ापे में तो विकराल रूप ले लिया है।

बचपन से 24-25 साल तक हम लोग स्कूलों में जाकर पढ़ाई करते हैं फिर आगे का 35 से 40 साल का जीवन अपनी मर्जी से जीने का और ऐसा मन की गहराई में बैठ जाता है कि सब "मैं ही कर रहा हूँ, मैंने ही सब पाया है".... (एक अहंकार गहराई तक मन में बैठ चुका होता है )

लेकिन इस दौरान भूल जाते हैं कि अपनी मर्जी से यहाँ कुछ नहीं होता है, होता वो ही है जो परमात्मा चाहता है।

यही भूला हुआ सत्य 60 के बाद जीने को मुश्किल बना देता है।

यदि 60 के बाद मान लें कि हम कुछ नहीं थे न कुछ हैं।

अब उसी परमात्मा को समर्पण कर देना है अपने आपको, तो फिर मृत्यु की आहट को भी गले लगाना सीख लेंगे।

आसान नहीं है ये सीखना - उससे पहले परमात्मा का अनुभव तो हो जो हमारे अंदर धूल फांक रहा है।

उस धूल को उड़ाना है और उसके लिए समय चाहिए जो कि 60 के बाद के लोगों के पास प्रचुर मात्रा में होता है।

और मजे की बात यह है कि परमात्मा को समर्पित होने के लिए विचार शून्य शांत ध्यान ही करना है।

आसान सा काम है ध्यान से समाधि तक लीन होने का अभ्यास।

पर, समस्या की एक वजह तो है बचपन से बुढ़ापे तक इकट्ठा किया हुआ अविद्या का कूड़ा-करकट जिसने अहंकार को इतना बढ़ा दिया कि जब तक कोई बुढ़ापे में तारीफ न करे तो दिन नहीं कटता, किसी को 2-4 बार डांट न दो तो अपने आप के होने का अहसास नहीं होता..

अकेलेपन से इतना डर लगने लगता है कि दिन में अपने आपको उबाते रहते हैं फिर खुश होने के लिए एक दूसरे अकेले आदमी को ढूंढना शुरू करते हैं - वो भी बेचारा ऊब रहा होता है - अब 2 ऊबने वाले मिलकर क्या करेंगे - बस फिजूल की बातें, सरकार को कोसना, परिवार के बच्चों को कोसना, पड़ोसी की बातें... मतलब कुल मिलाकर उद्देश्यहीन कृत्य से समय का काटना ही चलता रहता है।

सनातन में तो एक बड़ी सही व्यवस्था के तहत बताया गया है कि चौथी अवस्था संन्यास की है - अब इस अवस्था तक आते-आते मुक्ति की राह पकड़ लेनी चाहिए।

लेकिन हम लोगों ने संन्यास का मतलब जंगल जाने से, पहाड़ों पर बसने से समझ लिया - ये कोई संन्यास नहीं है बल्कि भागना है परिवार से, समाज से....

संन्यास तो है अंदर झांकने से - अपने अंदर की गहराई में उतरने से - अपने अंदर छिपे परमात्मा के ऊपर से पड़ी धूल को हटाने से, अंदर के जागरण से... लेकिन ये सब करने में अड़चनें लगती हैं - अपने आप से हम मिलना ही नहीं चाहते - पूरे जीवन भर सामने वाले की नजरों से अपने को जानने की आदत जो पड़ी होती है।

इसलिए बस एक और चाहिए होता है समय काटने के लिए - यही कारण है कि अकेले का समय काटने को दौड़ता है।

जैसे ही अकेले को जान लिया, उसके बाद दूसरे की जरूरत नहीं रह जाती।

जब दूसरा कोई नहीं रहे तो फिर कहाँ राग, विराग, अहंकार, ईर्ष्या? सब अपने आप खत्म हो जाते हैं।

फिर संसार में रहकर भी संन्यस्थ रहा जा सकता है।

लेकिन उसके लिए अपने आपको जानना बहुत जरूरी है।

और उसके लिए समय चाहिए जो रिटायरमेंट के बाद बहुत होता है।

समय का सदुपयोग है ध्यान, शून्य का ध्यान, सामाजिक कार्यों के साथ-साथ अपने आपको जानने के लिए ध्यान।

एक उद्देश्यहीन बुढ़ापे को मोक्ष प्राप्ति के प्रयत्न में लगाकर समय का सदुपयोग किया जा सकता है।

एक और दूसरी वजह है वो है "ऊर्जा".. इसके बिना बिस्तर से भी नहीं उठा जा सकता और ये बड़ी महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि ध्यान के लिए ऊर्जा कहाँ से लाई जाए?

बहुत सी ऊर्जा तो शारीरिक अंगों को संचालित करने में खर्च हो चुकी होती है।

इच्छाशक्ति जवाब दे चुकी होती है। शायद यही कारण है कि बुढ़ापे में ज्यादा कुछ कर नहीं पाते।

सोचना हमें है कि सही समय पर सही निर्णय लेकर मोक्ष प्राप्ति की ओर बढ़ जाएं या फिर मृत्यु तक उलझे रहें।

-- हरि ॐ तत् सत्

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