Hope (उम्मीद) का इस्तेमाल करके करोडों कमाये जा सकते हैं कैसे ?और सही से समझ जाओ तो मुक्ति ।
Hope है क्या ? एक भविष्य के लिए देखा गया सपना या सही से समझें तो *a modified or glorified form of past with attachment to expectation of future happenings*.
जैसे past में 1000 रुपये जेब मे थे future की hope अब 100,000 होंगे ।
एक व्यापारी के लिए ग्राहक बढाने की hope,
एक नौकरी करने वाले के लिए तनख्वाह बढ़ने की होप,
एक डॉक्टर के लिए मरीज बढ़ने की होप,
एक वकील के लिए अपराध बढ़ने की होप,
नेता के लिए वोट बढ़ने की होप या जीतने की होप और भी बहुत सारी hopes ..
ये होप्स बड़ी गहराई तक दिमाग मे बैठती है और बहुत जल्दी मन को भा जाती भी है , जीवन जीने का कारण भी बहुत जल्दी बन जाती है ,
आज बुरा है, कोई बात नहीं कल अच्छा होने की होप एक दिन और जीना सीखा देती है ।
इसी होप में छिपा है करोडों का बिज़नेस "सपने बेचने का", "बीमारी से छुटकारा पाने का", "अच्छे दिन का" ,"जल्दी अमीर बनने का" , "जल्दी सफल होने का" ...
This is how a psychologically, a shrewd businessman / politician / preacher / missionary play with the mind.
People fall into the trap of "Hope" ..
Why does such thing happen ?
Have you ever think about it ?
Reason is very simple ..A "Desire" .
Base of every hope is desire , A desire to be something or to have something .
this desire play very subtle role to give foundation to hope ...
बचपन से ही कुछ बनने की, कुछ करने की desire दिमाग मे ठूंसी जाती हैं और यंही से "उम्मीद" की नींव तैयार हो जाती है जिसे भविष्य में तमाम तरीके के लोग अपने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं और विडम्बना देखो इस्तेमाल होने वाले को पता भी नहीं चलता .
The moment desire lost next moment hope is vanished ...
A desirelessness clear the path of liberation (मुक्ति, मोक्ष ) .
Hope and Despair are nothing , just have same foundation of desire .. so don't fall in prey of Hope and Despair ..
तृष्णा से मुक्ति (desirelessness ) भी आसान नहीं है ,
desire के पेड़ की जड़ है ego..
" मुझे चाहिए" ( I want ) . In this statement "I" comes before "want" .. if there is no "I" left then automatically "want" become null and void ..
So to achieve desirelessness, need to work on "ego" ..
ये बात ऋषि मुनियों को बहुत पहले समझ मे आ गयी और इसे समझाने के लिए "रामायण" की इतनी बढ़िया रचना कर दी ताकि लाखों सालों तक लोगों के दिमाग में छाप छोड़ सके ।
अहंकार मुक्ति के मार्ग में आने वाली सबसे बड़ी बाधा है । और इस अहंकार को हराने के सबसे सरल उपाय है "समर्पण" ।
"जो घट चुका, जो घट रहा है, जो भी घटने वाला है, सब ईश्वर की मर्जी है" बस इतनी सी बात समझ में आ जाये तो मुक्ति , नहीं तो उलझनों का जाल फैला पड़ा ही है उलझने के लिए ।
-- हरि ॐ तत् सत्
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