नव दुर्गा ? ...
या मोक्ष प्राप्ति का सूत्र ?
धैर्य ,ब्रह्मचर्य और मन पर नियंत्रण करके ऊर्जा के प्रवाह को उच्च अवस्था में लाकर मोक्ष के लिए सेनानायक बन कर विचारों को समयातीत स्थापित कर विशुद्ध स्वरूप से मिलन पर ही सिद्धि प्राप्त होती है।
ये ही बात नवदुर्गा के रूप में लाखों सालों तक लोगों के दिमाग मे डालने की ही प्रथा है नवरात्रि ।
In a same sequence each day has been allocated to explain the importance of each act .
Day 1
धैर्य (शैलपुत्री) → साधना का आधार है। पर्वत की पुत्री की तरह अडिग रहना।
Day 2
ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचारिणी) → ऊर्जा का संरक्षण और तप में स्थिरता।
Day 3
मन पर नियंत्रण (चन्द्रघण्टा) → जब मन में ध्वनि-तरंग (घण्टा) और चन्द्रमा जैसी शीतलता का संतुलन होता है, तभी साधक स्थिर होता है।
Day4
ऊर्जा का प्रवाह (कूष्माण्डा) → भीतर ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की रचना और विस्तार।
Day 5
सेनानायक बनना (स्कन्दमाता) → अंतःशक्ति को दिशा देना; विचारों और इन्द्रियों का नेतृत्व करना।
Day 6
विचारों को समयातीत करना (कात्यायनी) → समय, कर्म और मन की सीमाओं से परे जाकर ‘शुद्ध संकल्प’ धारण करना।
Day 7
अंधकार का नाश (कालरात्रि) → अज्ञान, भय और मोह की रात्रि को समाप्त करना।
Day 8
विशुद्ध स्वरूप (महागौरी) → जब अंतःकरण निर्मल और पूर्ण श्वेत हो जाता है।
Day 9
सिद्धि की प्राप्ति (सिद्धिदात्री) → आत्मा अपनी पूर्णता और दिव्यता में जाग उठती है।
ये परम्परा बनाने के पीछे छिपा ज्ञान है जंहा हर परम्परा मोक्ष / मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए बनी है ।
जो श्री श्री रविशंकर कह रहें हैं वो इसी का विस्तार है , असुर कोई और नहीं मनुष्य के ही कुत्सित विचार ही हैं, जो मोक्ष प्रप्ति में बाधा है।
-- हरि ॐ तत् सत्
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