ज्यादातर मामलों में पारिवारिक झगड़ों का कारण सिर्फ और सिर्फ “रिएक्शन” होता है — एक त्वरित प्रतिक्रिया (quick reaction) जो क्रोध और आपसी कलह को जन्म देती है।
जैसे हम बिजली के बल्ब हों — किसी ने बटन दबाया और हम जल उठे।
बहुत दिनों तक सोचता रहा कि ऐसी प्रकृति हमारी क्यों बन गई?
कुछ लोगों ने इसे व्यक्तिगत स्वभाव का नाम दे दिया। लेकिन लगता तो नहीं कि यह मनुष्य-जाति का स्वभाव है। यदि यह स्वभाव होता तो मनुष्य को भी हिंसक जानवरों की तरह नुकीले नाखून, सींग या ऐसा कोई अंग अवश्य मिला होता, जो क्रोध से उत्पन्न हिंसा को सहारा दे सकता।
लेकिन ऐसा है नहीं। इसका मतलब यह है कि यह एक तरीके से विकसित किया गया “व्यवहार पैटर्न” है।
अच्छी तरह गौर करें तो पाएँगे कि जो जितना आधुनिक शिक्षा से “शुशोभित” (decorated) है, वही उतनी जल्दी रिएक्शन करता है।
आधुनिक मेडिकल साइंस कहती है कि यदि किसी को बार-बार गुस्सा आता है, चिड़चिड़ापन बना रहता है, तो इसके पीछे शरीर में cortisol, adrenaline, testosterone, serotonin जैसे हार्मोन का असंतुलन जिम्मेदार होता है।
मतलब कहीं न कहीं इन हार्मोनों का संतुलन उम्र के किसी पड़ाव पर बिगड़ जाता है और व्यवहार में बदलाव क्रोध या चिड़चिड़ेपन के रूप में प्रकट होता है।
लेकिन सवाल वही है—आख़िर यह संतुलन क्यों बिगड़ता है?
मेडिकल साइंस के अनुसार यदि हम “बल्ब” मानें तो यह हार्मोन ही बल्ब हैं और सामने वाले के शब्द वह बटन हैं, जो इन्हें ट्रिगर कर देते हैं।
अब इसमें दो स्टेप्स हैं—
1. सामने वाले का बटन दबाना (कुछ बोलना)।
2. और फिर उस बटन का दब जाना (हमारा रिएक्ट करना)।
सामने वाले को रोक तो नहीं सकते, लेकिन अपने बटन को दबने क्यों दें? यही Anger Management क्लासेज़ में सिखाया जाता है—“Listen, but don’t react at that moment.”
जानते सब हैं, लेकिन पालन क्यों नहीं कर पाते?
उसका कारण है “आदत”।
आदत को बदलना इतना आसान नहीं है। यह क्विक रिएक्शन वाली आदत बचपन से सीखी जाती है। जितने पुराने हम हैं, उतनी ही पुरानी यह आदत है।
जिस दिन बच्चे को स्कूल में डाला जाता है, उसी दिन से आधुनिक शिक्षा उसे “क्विक रिएक्शन” देना सिखाना शुरू कर देती है।
लेकिन भूल जाती है कि यही आदत आगे चलकर उसके जीवन में पारिवारिक कलह लेकर आएगी।
यह तेजी स्कूल में अच्छे मार्क्स दिला देती है, ऑफिस में प्रमोशन दिला देती है, लेकिन रिश्तों में दरार पैदा कर देती है।
धीरे-धीरे दिमाग इस गति का आदी हो जाता है—स्कूल, कॉलेज, ऑफिस—हर जगह क्विक रेस्पॉन्स देने की आदत बन जाती है।
आसपास के लोग ऐसे बच्चे को “होशियार” या ऐसे कर्मचारी को “इंटेलिजेंट” कहकर सराहते हैं।
यह सराहना इस आदत को और भड़काती है और व्यक्ति और भी अधिक त्वरित प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित होता है।
लेकिन यही क्विक रिएक्शन जब परिवार की चारदीवारी में प्रवेश करता है तो संघर्ष शुरू हो जाता है।
क्योंकि सामने वाले को आपकी “इंटेलिजेंस” में अपनी हार दिखती है, अपना घमंड टूटता हुआ दिखता है, और उसे यह डॉमिनेंस (प्रभुत्व) लगता है।
यहीं से झगड़े की शुरुआत होती है।
अब सवाल है—इसका जिम्मेदार कौन है?
आपका “so-called intelligent” होना?
या हाजिर-जवाब होना?
या चुटकियों में जवाब देने की आदत?
या फिर तार्किक बातों से सामने वाले को परास्त करने की प्रवृत्ति?
परिवार जीवन का एक अलग ही युद्ध-क्षेत्र (war front) है, जो अनिवार्य है, नियत है।
आप पढ़ाई में कमजोर हों, कम पैसे कमाएँ, मेहनत करें या न करें—लेकिन पारिवारिक युद्ध-क्षेत्र में आना ही पड़ता है। (कुछ विरल लोग होते हैं जो इस फ्रंट से दूर रहते हैं, पर उनकी बात अलग है।)
और यहाँ जीवन का ऐसा युद्ध चलता है कि यदि जीतेंगे तो हारेंगे ही।
यहाँ पर हारना ही असली जीत है।
यही शिक्षा आधुनिक शिक्षा के विपरीत है।
आधुनिक शिक्षा सिखाती है—प्रतिस्पर्धा (competition) करो और जीतों।
जबकि परिवार चलता है—प्रतिस्पर्धा को खत्म करने से। परिवार में प्रतिस्पर्धा होनी ही नहीं चाहिए।
लेकिन 20–25 साल पुरानी आदत ऐसे कैसे खत्म हो जाए?
इसलिए अगली बार जब भी ऐसी स्थिति आए तो ध्यान दीजिए—
उस प्रतिस्पर्धा को खत्म करने की कोशिश कीजिए।
पर यह अकेले से नहीं होगा।
दोनों को समझना होगा।
यदि केवल एक व्यक्ति प्रतिस्पर्धा खत्म करेगा तो सामने वाले को “हार” का भय और “घमंड” पर चोट महसूस होगी।
लेकिन इस “हार” के भय से निकलना बहुत आसान है।
समय निकालकर श्रीमद्भागवत गीता पढ़िए।
यदि वहाँ समाधान न मिले तो अष्टावक्र गीता पढ़िए।
यदि समय न हो तो सुनिए।
और यदि इतना भी समय न हो तो ध्यान कीजिए।
-- हरि ॐ तत् सत्
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