गणित के आदमी को तर्क समझ में आता है इसलिए परमात्मा को जानना और समझना बहुत कठिन हो जाता है ।
बड़ी मजेदार बात है जंहा तर्क खत्म होता है वंही से परमात्मा की खोज शुरू होती है , तर्क तो बस उलझाये रखते हैं शब्दों के जाल में।
बीज के अंदर 2000 साल तक जीवित भ्रूण रह सकता है , तार्किक लोगो को आश्चर्य नही होता ऐसा कैसे संभव है ?
किसने इसकी रचना की ?
किस की परिकल्पना रही होगी कि छोटे से बीज में भी जीवन छिपा हो सकता है ?
आज का विज्ञान उसे समझाने की कोशिश तो करता है पर ये नही बता पाता किसने ये प्रोसेस develop की ?
एक छोटे से बीज जो कंही किसी से कनेक्ट नहीं, बाहरी वातावरण से कनेक्ट नहीं फिर भी उसमें एक वृक्ष को जन्म देने की ताकत !
बस सही हवा पानी मिट्टी मिली नही और हजार सालों में भी वृक्ष बनाने की क्षमता रखता हो।
विज्ञान बस प्रोसेस कैसे हो रही है उसे अपने शब्दों में समझाने की कोशिश करता है लेकिन वो सही है भी या नही ये कोई नहीं कह सकता , विज्ञान का सत्य तभी तक टिकता है जब तक कोई उसका खंडन करने ना आये ।
न्यूटन का विज्ञान आइंस्टीन तक 100% सत्य माना गया लेकिन आइन्सटीन के बाद वो भी डांवाडोल होने लगा और multiverse की बातें होना शुरू हो गयी है संभावना पूरी है कि अगले 50 - 100 सालों में आईन्स्टीन के विज्ञान में भी कोई करेक्शन देखने को मिल जाये ।
लेकिन तर्क ये नही बता पाता आखिर इस कॉम्प्लिकेटेड प्रोसेस की परिकल्पना किसने की ? किसका प्रोजेक्ट रहा होगा जिसने बीज में जीवन को छिपाने की बात सोची होगी ?
ये फिर सब अनायास ही हो गया या फिर तर्क ने हार मान ली ?
नहीं , ये सब के पीछे कोई हो नहीं सकता यदि किसी को इस सबके पीछे मान लिया तो अगला सवाल होगा कि उसके पीछे कौन ? उसे किसने बनाया ?
बात बस तर्कों में ही उलझ जाएगी , सवाल वंही के वंही रह जाएंगे ।
इसलिए परमात्मा को समय के पार, असीम, अनन्त , निराकार , निर्गुण, कहे तो ज्यादा सही जान पड़ता है।
कुछ लोग शून्य को भी परमात्मा बताते हैं एक शून्य ही है जिस में सब समा जाता है ।
और शून्य से अनंत तक ,सब परमात्मा ही नजर आता है ।
इसलिये प्रबुद्ध कहते हैं कि परमात्मा को शब्दों में बांध ही नही सकते ये तो अनुभव मात्र से समझा जा सकता है ।
जो शब्दों में बंध जाये, तर्क में उलझ जाये वो परमात्मा हो ही नही सकता ।
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