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मंदिर

 मंदिर

शब्द सुनते ही सबसे पहले मस्तिष्क में एक परिकल्पना उभरती है — एक ऐसे स्थान की, जिसे मंदिर बनाकर मस्तिष्क में कहीं fit कर दिया गया हो।

वैसे मंदिर है क्या?

मूल शब्द मंदिर को बनाने के लिए इस्तेमाल होता है "मन"।

मन् + दिर

मन् = मन (चित्त, सोचने की शक्ति)

दिर = स्थिर (टिके रहना) → "स्थिर होने का स्थान" या "धारण करने का स्थान" (धृ धातु)

अर्थात जहाँ मन स्थिर हो जाये, या जहाँ मन को धारण किया जा सके — वही स्थान मंदिर है।

और मन को स्थिर रखने की प्रक्रिया ही तो “ध्यान” है।

अक्सर लोग पूछते हैं — “मंदिर क्यों जाना चाहिए?” …
फिर अजीब-अजीब से कुतर्क देकर मंदिर जाने के कारणों को साधने की कोशिश की जाती है।
जो नई पीढ़ी को बिल्कुल भी रास नहीं आती । in result of that they start moving away from it.

Let's understand the deep thought behind it..

मंदिर एक प्रतीक है — अन्तर्मन में झाँकने की जगह का,
a place to inspire for deep “Dhyana”.

बाह्य मंदिरों के अंदर रखी प्रतिमा और घंटी भी प्रतीक ही हैं:

जब ध्यान से समाधि की अवस्था में जाते हैं तो “अनाहत नाद” (घंटी की ध्वनि) सुनाई देता है।

जब positive समाधि में जाते हैं तो शांत मन केवल एक पर केंद्रित हो जाता है। उसी एक को समझाने के लिए मंदिर में प्रतिमा रखी गयी है।

जब absolute समाधि में होते हैं तो वह एक भी नहीं रहता।
फिर सब शून्य — entire emptiness। वही परमावस्था है जिसे मोक्ष या महानिर्वाण कहा गया है।

हमारे पूर्वज ऋषि–मुनि गज़ब के क्रांतिकारी थे।

Psychology में एक amazing theory है — “observer is being observed”।

A state of continuous observation about any X thing, forces the observer to become the same X thing.

For example:
आप Korean drama follow करना शुरू करते हैं। धीरे-धीरे आप real life में भी उसे copy करने लगते हैं — slim Korean guy जैसा living, Korean words बोलना, actors/actresses जैसी acting करना इत्यादि।

यही दूसरा कारण रहा होगा कि —
बाह्य मंदिर जाकर प्रतिमा का observe कीजिये…
इतने गहरे ध्यान से observe कीजिये कि स्वयं वही बनने की धारणा प्रबल हो जाए, और मुक्ति की राह के लिए inspiration मिल जाए।

लेकिन ध्यान दीजिये — “ध्यान” का महत्त्व दोनों कारणों में उपस्थित है।

ध्यान के इस महत्त्व को समझाने के लिए ही जैन मंदिरों में तो 2 ही तरीके की प्रतिमा होती है , पद्मासन या खड्गासन और दोनों ही ध्यान की अवस्था में होती है ।

यह सत्य बहुत क्रांतिकारी है।

इस सत्य की उद्घोषणा मात्र से ही धर्म के ठेकेदारों का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा।

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